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डायट प्राचार्य मिशन प्रेरणा प्रशिक्षण कार्यक्रम का किया निरीक्षण

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गोरखपुर*/पिपराइच विधानसभा क्षेत्र के विकासखंड भटहट बीआरसी पर प्राचार्य/उपशिक्षा निदेशक गोरखपुर भूपेंद्र कुमार सिंह मिशन प्रेरणा के दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के 7 वे बैच का निरीक्षण कर प्रशिक्षुओं को संबोधित किया ।
बीआरसी भटहट पर दिनांक 19/02/2021 से मिशन प्रेरणा अन्तर्गत आधारशिला क्रियान्वयन संदर्शिका,समृद्ध हस्तपुस्तिका, सहजपुस्तिका, गणित किट, प्रिंट रिच मटेरियल आधारित दो दिवसीय शिक्षक प्रशिक्षण प्रारंभ है जिसके प्रशिक्षण कार्यक्रम मे उप शिक्षा निदेशक पहुंच कर कार्यक्रम का निरीक्षण किया । निरीक्षण के दौरान प्रशिक्षण में उपस्थित प्रशिक्षुओं में एक प्रशिक्षु शिक्षिका रमा मौर्य औचक प्रशिक्षण की जानकारी प्राप्त की, शिक्षिका ने बेबाकी से प्रतिउत्तर में प्रशिक्षण को समझाते हुए आधारशिला, समृद्ध हस्तपुस्तिका , प्रिंट रिच मटेरियल की उपयोगिता को सभी के समक्ष रखा। डायट प्राचार्य अपने संबोधन सुझाव में मिशन प्रेरणा के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कक्षा एक के बच्चो को विद्यालय में सबसे सुंदर वातावरण वाले कमरे में बैठाया जाए तथा उनसे सरल से सरल भाषा, तकनीकी एवं शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग किया जाए जिससे बच्चो एवं शिक्षक के बीच संबंध में मधुरता तो आएगी साथ ही सीखने की लालसा विकसित होगी । कक्षा एक के छात्रों में अक्षर,शब्द , मात्रा आदि का लेखन व समझ को विकसित किया जाय ।
इस अवसर पर प्राचार्य संग डायट प्रवक्ता साहेब आलम अंसारी प्रशिक्षक जितेंद्र कुमार मिश्र, अवधेश कुमार ,विवेक श्रीवास्तव , सत्यप्रकाश सिंह प्रशिक्षु शिक्षक/शिक्षिका वंदना चतुर्वेदी,संतोष सिंह,आरती त्रिपाठी , इरफान हुसैन, अफजाल समानी,फकरुद्दीन समेत 60 प्रशिक्षु उपस्थित थे।

आलम बाग ए सी पी बिक्रम सिंह से खास बातचीत की पत्रकार अटल बिहारी शर्मा”

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लखनऊ-आलम बाग थाने के ए सी पी बिक्रम सिंह से आवाज जन जन की एडिटर इन चीफ (क्राइम रिपोर्टर) अटल बिहारी शर्मा ने मुलाकात करके थाने का हाल जाना तथा अपराध भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे इसके बारे में भी चर्चा किया ए सी पी बिक्रम सिंह ने बताया कि पुलिस कमिश्नर डी के ठाकुर जी के दिशा-निर्देश पर आलम बाग पुलिस कार्य करके हर संभव प्रयास करके अपराधी भ्रष्टाचारी पर सिकंजा कसती नजर आ रही है। जो भी अपराधी हमारे थानो के अन्तर्गत गलत कार्य करते पाया जाता है उस पर सख्त से सख्त कार्रवाई करके जेल भेजा जायेगा उन्होने ये भी कहा कि पुलिस और पत्रकार का चोली दामन का साथ होता है जब तक किसी बात की पुष्टी न हो जाये तब तक एक दुसरे पर आरोप भी न लगायें। ए सी पी बिक्रम सिंह के बातो से साफ जाहिर होता है कि इनके एरिया मे दलाल चापलूस या अराजक तत्व का कोई मतलब य सुनवाई नही होगा।
हम ऐसे अधिकारी थाना प्रभारी उपनिरीक्षक तथा पुलिस कर्मचारी को दिल से धन्यवाद करते हैं। जो अपराधी भ्रष्टाचारी से कोई समझौता नही करते। आवाज जन जन की एडिटर इन चीफ अटल बिहारी शर्मा लखनऊ*?

माफिया बनाम माफिया: वर्चस्व की लड़ाई में कट रहीं गर्दनें

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उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल इलाका अपराध और राजनीतिक गठजोड़ के लिए जाना जाता है. ‘अपराध का राजनीतिकरण’ या ‘राजनीति का अपराधीकरण’ जैसे चर्चित मुहावरों की इसी कड़ी में गाजीपुर के मुख़्तार अंसारी और बृजेश सिंह का भी नाम आता है. पूर्वांचल में माफियाओं का खासा दबदबा है. इन माफिया गिरोहों का कोयले का कारोबार, खनन और रेलवे के स्क्रैप समेत ठेके पट्टे में हस्तक्षेप है. वैसे तो दोनों बाहुबली माफियाओं का सियासत में दखल है, लेकिन आजकल मौसम माफिया बृजेश सिंह के अनुकूल है. इसीलिए कहा जा रहा है कि बृजेश सिंह का पलड़ा भारी है. बृजेश सिंह अपने शतरंज की बिसात बिछाये हैं. नतीजन एक-एक करके मुख्तार अंसारी के मजबूत विकेट गिर रहे हैं. जानकारों की मानें तो जेल में बंद बृजेश ने इस काम को अमली जामा पहनाने के लिए पूर्वांचल के एक बाहुबली पूर्व सांसद को मोहरा बनाया. जेल में रची साजिश को इसी योजना के तहत अंजाम दिया जा रहा है.सूबे के टॉप बाहुबली बृजेश के संग सूत्रों की माने तो बाहुबली बृजेश सिंह के साथ सूबे के टॉप बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह, पूर्व सांसद धनंजय सिंह, पूर्व एमएलसी सुशील सिंह, एमएलसी रामू द्विवेदी समेत कई बाहुबली उसके साथ हैं. यह माफिया एक खास प्रभावशाली वर्ग के माफिया के गैंग को खत्म करने का ब्लूप्रिंट तैयार कर चुका है. योजना के तहत ही सूबे में बाहुबली मुख्तार अंसारी के पांच करीबी लोगों की हत्या कर दी गई. खास बात यह रही कि इन सारी हत्याओं में अपरोक्ष रूप से पूर्व बाहुबली सांसद का नाम उभर कर आया. हालांकि 4 मामलों में विवेचना के दौरान पूर्व बाहुबली सांसद को क्लीन चिट दे दी गई. मगर हाल ही में हुए मऊ में मोहम्मदाबाद के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अजीत सिंह हत्याकांड में धनंजय सिंह को साजिश रचने, साक्ष्य मिटाने एवं हत्या आरोपियों को संरक्षण देने का आरोपी बनाया गया है. इस कार्रवाई से यूपी की सियासत में हलचल मच गई है, क्योंकि सियासत का एक वर्ग पूर्व सांसद धनंजय सिंह को क्लीन चिट दिलाने की पैरवी कर रहा था. अब पुलिस धनंजय सिंह को गिरफ्तार करने के लिए दबिश दे रही है. धनंजय सिंह कोर्ट में हाजिर होने या फिर हाईकोर्ट से अरेस्टिंग स्टे लेने के प्रयास में लगे हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि पुलिस कोर्ट में पैरवी कर धनंजय सिंह की संपत्ति कुर्क करने की तैयारी कर रही है.इन पांच की हुई हत्या पिछले पांच सालों में बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के पांच खास लोगों को गोलियों से भून दिया गया. इसमें मुख्य रूप से गोमती नगर इलाके में शार्प शूटर मुन्ना बजरंगी उर्फ प्रेम प्रकाश सिंह उसके साले पुष्पजीत सिंह साथ में जौनपुर के शिक्षक संजय मिश्रा और अब मऊ में मोहम्मदाबाद के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अजीत सिंह की हत्या शामिल है.ऐसे काम करते हैं बाहुबली सूबे के एक उच्चपदस्थ अफसर बताते हैं कि 1990 के दशक का अंत आते-आते पूर्वांचल के माफियाओं ने खुद को राजनीति में लगभग स्थापित कर लिया. मुख़्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी पहले से ही राजनीति में थे. इसलिए मुख़्तार के लिए राजनीति में आना आसान था. बृजेश ने अपने बड़े भाई उदय नाथ सिंह उर्फ चुलबुल को राजनीति में उतारा. पहले उदय नाथ सिंह विधान परिषद के सदस्य रहे और उनके बाद उनके बेटे और बृजेश के भतीजे सुशील सिंह विधायक बने. एनकाउंटर से बचने के लिए लड़ते हैं चुनाव लखनऊ कमिश्नर डीके ठाकुर बताते हैं कि बिना राजनीतिक शह के माफिया नहीं पनप सकते. राजनीति में जाने का एक कारण अपने व्यापारिक निवेशों को सुरक्षित करना, उन्हें बढ़ाना देना और राजनीतिक पार्टियों में अपना दखल बढ़ाना भी होता है. माफिया चाहते हैं कि एसटीएफ को डराकर रखे. उन्हें लगता है कि अगर चुनाव जीत गए तो एसटीएफ एनकाउंटर नहीं करेगी या नहीं कर पाएगी.रेत माफिया पर रेड करती पुलिस
एसटीएफ के एक इंस्पेक्टर कहते हैं कि पूर्वांचल में आज करीब 250 के आसपास गैंगस्टर बचे हैं. इनमें से कुछ राजनीति में हैं और जो नहीं हैं वो आना चाहते हैं. इनमें से पांच हजार करोड़ रुपये से ऊपर की एसेट वैल्यू वाले 5-7 नाम हैं. 500 करोड़ से ऊपर की एसेट वैल्यू वाले 50 से ज्यादा नाम हैं. बाकी जो 200 बचते हैं, वो टॉप के 5 माफियाओं जैसा बनना चाहते हैं माफिया ने कैसे पसारे पांव
पूर्व डीजीपी एके जैन बताते हैं कि संगठित अपराध में शामिल होना तो माफिया होने की पहली शर्त है. फिर स्थानीय राजनीति और प्रशासन में दखल रखना और गैर-कानूनी काले धन को कानूनी धंधों में लगाकर सफेद पूंजी में तब्दील करना, दूसरी जब यह तीनों फैक्टर मिलते हैं तभी किसी गैंगस्टर या अपराधी को ‘माफिया’ कहा जा सकता है.

फरार आइपीएस की संपत्तियां कुर्क करने को एंटी करप्शन कोर्ट में दाखिल की गई अर्जी,साढ़े पांच महीने से खोज रही पुलिस

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उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में क्रशर व्यापारी की हत्या और रंगदारी मांगने के मामले में फरार चल रहे महोबा के निलंबित एसपी आइपीएस मणिलाल पाटीदार की संपत्तियों को कुर्क करने के लिए एंटी करप्शन कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। यहां से अनुमति मिलते ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। पूर्व एसपी महोबा के खिलाफ लगातार हो रही कार्रवाई से उन पर शिकंजा कसता जा रहा है। धारा 82 के तहत पहले ही घर पर नोटिस किया जा चुका है चस्पा महोबा के क्रशर व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी पर पहले जानलेवा हमला हुआ था। अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। क्रशर कारोबारी के परिवार के लोगों ने महोबा के पूर्व एसपी मणिलाल पाटीदार के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया था। पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी को लेकर कई जगह दबिश दी, लेकिन वह हाथ नहीं लगे। इसके बाद उन पर 50 हजार का इनाम घोषित किया गया था। कुछ दिन बाद पूर्व एसपी पर भ्रष्ट्राचार का एक और मुकदमा लिखा गया था। शुक्रवार को ईडी ने भी उनके खिलाफ मनी लांड्रिग की रिपोर्ट दर्ज की। उधर, मामले की विवेचना कर रहे एसपी क्राइम प्रयागराज आशुतोष मिश्रा ने फरार आइपीएस मणिलाल पाटीदार की संपत्तियों को कुर्क करने के लिए एंटी करप्शन कोर्ट में अर्जी दाखिल कर दी है। इसकी जल्द ही सुनवाई होगी। पूरी संभावना है कि कोर्ट कुर्की का आदेश देगी और फिर पूर्व एसपी की संपत्तियों को कुर्क किया जाएगा। इसके पहले पुलिस धारा 82 के तहत उनके यहां नोटिस चस्पा कर चुकी है। कई अचल संपत्तियों को किया गया है चिह्नित फरार आइपीएस मणिलाल राजस्थान के रहने वाले हैं। उनकी वहां भी काफी संपत्तियां हैं। इसके अलावा उनकी कई और संपत्तियों का पुलिस को पता चला है। प्रयागराज और महोबा पुलिस ने संयुक्त रूप से इसकी तफ्तीश की थी। हालांकि, ज्यादातर संपत्तियां मणिलाल के पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर है। भ्रष्टाचार से मणिलाल ने कितनी संपत्ति अर्जित की है, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।

यूपी पंचायत चुनाव : जानिए इस बार ग्राम प्रधान और बीडीसी उम्मीदवारों को क्या-क्या मिल सकते हैं चुनाव चिह्न

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यूपी पंचायत चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 1994 में जारी एक अधिसूचना के जरिये ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान, क्षेत्र व जिला पंचायत सदस्य के पदों पर खड़े होने वाले उम्मीदवारों के लिए चुनाव चिन्हों की संख्या निर्धारित की गयी है। सबसे कम 18 चुनाव चिन्ह ग्राम पंचायत सदस्य के पद के लिए तय हैं। इनमें आम, ओखली, अंगूर, केला, गुलाब का फूल, घड़ा, डमरू, तम्बू, पेंसिल, फरसा, बंदूक, बैडमिण्टन का बल्ला, नल, ब्रश, ब्लैकबोर्ड, रिक्शा, शंख और सुराही शामिल हैं। यही नहीं राज्य निर्वाचन आयोग के अफसर भी यह मान कर तैयारी कर रहे हैं कि इस बार मतदान में प्रत्येक वोटर को वोट डालने में अपेक्षाकृत ज्यादा समय लगेगा और इस वजह से मतदान शाम पांच बजे के निर्धारित समय के बाद भी चल सकता है। नियम यह है कि मतदान की अवधि खत्म होने तक मतदान केन्द्र परिसर में जितने भी लोग लाइन में लगे होंगे उन्हें वोट डालने का अधिकार होगा समय चाहे जितना भी लगे।

आज शिव सेवा समिति उत्तर प्रदेश की साधारण सभा की बैठक प्राचीन शिव मंदिर पर आयोजित किया गया

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आज शिव सेवा समिति उत्तर प्रदेश की साधारण सभा की बैठक प्राचीन शिव मंदिर पर आयोजित किया गया। बैठक की अध्यक्षता चन्द्र प्रकाश मिश्र ने की, बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री अशोक जैसवाल भी सम्मिलित हुए,जिनका स्वागत समिति के सचिव राकेश पांडेय व उपस्थित सदस्यों ने करतल ध्वनि से किया। श्री अशोक जैसवाल ने भव्य शोभा यात्रा व सामूहिक कन्या विवाह हेतु अपना सम्पूर्ण योगदान देने की बात कही। बैठक में तमाम महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर गम्भीरतापूर्वक चिंतन किया गया। अध्यक्ष महोदय ने सदस्यता अभियान चलाने की बात कही,जिसकी रूपरेखा बनाई गई।
बैठक में उपप्रबंधक वीरेंद्र अग्रहरि,कोषाध्यक्ष रामजी मद्धेशिया, ऑडिटर सूरज मद्धेशिया,सोशल मीडिया प्रभारी प्रफुल्ल गुप्ता, कार्यक्रम नियंत्रक संतोष अग्रहरि,सचिन्द्र मद्धेशिया, सुरज शुक्ला और पूर्व प्रधान गणेश गुप्ता, दयाशंकर अग्रहरि, आशीष अग्रहरि ,शिव प्रकाश गुप्ता ,‌दुर्गा प्रसाद अग्रहरि, मुरली मनोहर अग्रहरि(शेरु), प्रिंस सिंह , शंकर मद्धेशिया, शिव कुमार , कन्हैया शर्मा, सुख सागर, सहित तमाम सदस्य उपस्थित रहे।

पत्रकारिता को जिले में एक नया आयाम देने के लिए हमेशा आवाज बुलंद करता रहुंगा:सुनील पाण्डेय

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जनपद महराजगंज के जाने माने अमिट रेखा पत्रकार ब्यूरो चीफ/मंडल प्रभारी सुनील कुमार पाण्डेय जिन्होंने पत्रकार साथियों के लिए कंधे से कंधा मिलाकर उनके हक के लिए शासन एवं प्रशासन से आवाज को बुलंद करने का कार्य किया। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है लोकतंत्र मे अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है।और समाज की बात को सरकार तक पहुंचाने और सरकार की बात को समाज तक पहुंचाने का काम पत्रकार करता है।पत्रकार वह सच भी उजागर करता है जिन पर पर्दा पड़ा होता है लेकिन सच का सामना कराने पर आज पत्रकार को या तो झूठे मुकदमों का सामना करना पडता है या उसकी हत्या करवा दी जाती है।आज पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग काफी लंबे समय मांग कर रहे हैं।जिस समय संविधान निर्माताओ ने प्रेस कानून बनाया था उस समय केवल वुद्धिजीवी वर्ग ही इस क्षेत्र मे था और पत्रकारिता के माध्यम से समाज को नई दिशा दिखाता था लेकिन आज परिस्थितियां विपरीत हो गयी है और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अस्तित्व बचाने के लिए कुछ बदलाव की भी आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि समाचार कवरेज के दौरान मार्ग दुर्घटना में पैर फैक्चर हो गया।परंतु मैंने अपने कलम को रोका नहीं बल्कि और धार दी।जिले के सैकड़ों पत्रकार साथियों ने मेरा हाल चाल जाना हमारी स्थिति देखने पत्रकार साथियों के साथ क्षेत्रीय विधायक एवं प्रशासनिक अधिकारी भी पहुंचे।मैं आप सभी लोगों का शुक्रगुजार हूं जो आप सभी ने मेरा हौसला बढ़ाया।उन्होंने कहा कि मैं अपने पत्रकार साथियों के साथ हर समय सबसे आगे खडा रहने के लिए तैयार हू।
पत्रकारो को स्थानीय स्तर पर जब तक सरकारी सुविधाओं का लाभ तब तक नहीं मिल जाता हम पत्रकारों के हक में अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।

औरंगजेब शेख की हुई पदुन्नती बने प्रदेश मंत्री से प्रदेश संयुक्त महासचिव।

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राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं आरटीआई जागरूकता संगठन भारत के होनहार एवं संघर्षसील एवं ओजस्वी युवा औरंगजेब शेख जी काफी लम्बे समय से मानवाधिकार के प्रति अपना सर्वस्व न्योछावर किए हुए थे , तथा समाज में हर स्तर से गरीब असहाय एवं पीड़ित व्यक्तियों की मदद करते है, तथा समय समय पर सभी प्रकार की योजनाओं कल लाभ भी प्राप्त करने के लिए समाज के सभी लोगो को जागरूक करने एवं उनके उत्थान के लिए प्रेरित करते रहते है, जिसके चलते समाज में इनकी एक अलग ही नई पहचान बनी हुई है, इन्ही सब अच्छे कार्यों को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं आरटीआई जागरूकता संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संगेश कुमार भाटी जी ने औरंगजेब शेख जी को प्रदेश मंत्री से प्रदेश संयुक्त महासचिव का पद का भार सौंपा । तथा साथ ही साथ काफी प्रसन्न होकर निरंतर समाज कल्याण हेतु ढेर सारी शुभकामनाएं देते हुए शेख जी के उज्जवल भविष्य की कामना की । प्रदेश अध्यक्ष मनोज त्यागी जी हरियाणा , प्रदेश उपाध्यक्ष बुद्धेश मनी त्रिपाठी , मेगी देवी ,रघुवंश उपाध्याय तफज्जुल अंसारी निचलौल तहसील अध्यक्ष आदि सम्मानित पदाधिकारीगण ने ढेर सारी बधाइयां एवं शुभकामनाएं देते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना की ।

याेगीराज में नही मिल रहा आवास,आवास देने के एवज में माँगा जा रहा पैसे

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यूपी के जनपद महराजगंज के निचलौल ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम सभा करमहिया के बजरंगदल के नेता/जिला गौ रक्षा प्रमुख को योगिराज में नही मिल रहा आवास,आवास देने के एवज में माँगा जा रहा पैसे।अधिकार भी मौन।अगर हकीकत में देखा जाए तो जिसे आवास की आवश्यक्ता है उसे आवास नही दिया जा रहा और जो अमीर लोग है उन्हें आवास मिला है पर जो गरीब है मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे जिनके पास आवास नही है उन्हें आवास नही दिया जा रहा है।ठीक ऐसा ही इस विडोज में दिखा रहे है जो 7 साल से जिला गौ रक्षा प्रमुख महराजगंज के पद है जिनकी दयनीय स्तिथि खराब है बेहद गरीब है ना आवास है ना ज्यादा खेती फिर भी मेहनत मजदूरी करके घर चलाते है। और संगठन कार्य मे रुचि रखते है। अतः माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदियनाथ जी से निवेदन है कि हमे आवास उपलब्ध कराने की कृपा करें।

पूर्वांचल में माफ़िया गैंगवार शुरू होने की कहानी

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उत्तर प्रदेश के 24 पूर्वी ज़िलों की 29 लोकसभा सीटों वाला पूर्वांचल हर बड़े चुनाव में अपने भौगोलिक दायरे से आगे बढ़कर नतीजों और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता रहा है. एक और ख़ास बात ये है कि पूर्वांचल की राजनीति में संगठित माफ़िया सरगनाओं का दबदबा रहा है.पूर्वांचल का माफिया मैप 1980 के दशक में गोरखपुर के ‘हाता वाले बाबा’ के नाम से पहचाने जाने वाले हरिशंकर तिवारी से शुरू हुआ राजनीति के अपराधीकरण का यह सिलसिला बाद के सालों में मुख़्तार अंसारी, बृजेश सिंह, विजय मिश्रा, सोनू सिंह, विनीत सिंह और फिर धनंजय सिंह जैसे कई हिस्ट्रीशीटर बाहुबली नेताओं से गुज़रता हुआ आज भी पूर्वांचल में फल-फूल रहा है.अपने साथ-साथ अपने परिजनों के लिए भी पंचायत-ब्लॉक कमेटियों से लेकर विधान परिषद, विधान सभा और लोकसभा तक में राजनीतिक पद सुनिश्चित कराने वाले पूर्वांचल के बाहुबली नेता अपने-अपने इलाके में गहरी पैठ रखते हैं.गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज से शुरू होने वाला राजनीतिक बाहुबल का यह प्रभाव, आगे फ़ैज़ाबाद, अयोध्या, प्रतापगढ़, मिर्ज़ापुर, ग़ाज़ीपुर, मऊ, बलिया, भदोही, जौनपुर, सोनभद्र और चंदौली से होता हुआ बनारस और प्रयागराज तक जाता है.कैसे पांव पसारे माफ़िया ने?*
उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध से लड़ने के लिए ख़ास तौर पर गठित की गई स्पेशल टास्क फ़ोर्स (एसटीएफ़) के आईजी अभिताभ यश बताते हैं, “संगठित अपराध में शामिल होना तो माफ़िया होने की पहली शर्त है. फिर स्थानीय राजनीति और प्रशासन में दख़ल रखना और ग़ैर-क़ानूनी काले धन को क़ानूनी धंधों में लगाकर सफ़ेद पूंजी में तब्दील करना दूसरी दो ज़रूरी बातें. जब यह तीनों फ़ैक्टर मिलते हैं, तभी किसी गैंगस्टर या अपराधी को ‘माफ़िया’ कहा जा सकता है”.
2007 में उत्तर प्रदेश के दुर्दांत माफ़िया ददुआ का एनकाउंटर करने वाले अमिताभ माफ़िया की राजनीतिक भूमिका पर कहते हैं, “अगर किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता है, तो माफ़िया की भूमिका काफ़ी सीमित हो जाती है. लेकिन बिखरे हुए नतीजे आने पर इनकी भूमिका अचानक बढ़ जाती है क्योंकि इनका असर भले ही क्षेत्रीय हो लेकिन राष्ट्रीय चुनाव में अक्सर ऐसे स्थानीय प्रत्याशी बड़ी तस्वीर की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा जाते हैं.”आज राजनीति और व्यापार तक पांव पसार चुके पूर्वांचल के इस गैंगवार की शुरुआत सन 1985 में ग़ाज़ीपुर ज़िले के मुढ़ीयार गांव से हुई थी. यहां रहने वाले त्रिभुवन सिंह और मनकु सिंह के बीच शुरू हुआ ज़मीन का एक मामूली विवाद देखते ही देखते हत्याओं और गैंगवार के एक ऐसे सिलसिले में बदल गया जिसने पूर्वांचल की राजनीतिक और सामाजिक तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया.पूर्वांचल में संगठित अपराध को चार दशकों से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह मानते हैं कि पूर्वांचल में गैंगवार का शुरू होना एक संयोग था.
अब तक 1990 का दशक शुरू हो चुका था और ग़ाज़ीपुर के एक गांव का विवाद एक बड़े गैंगवार में तब्दील हो चुका था. पवन आगे बताते हैं, “माफ़िया सरगना रहे साहिब सिंह ने चुनाव लड़ने के लिए आत्मसमर्पण किया. बनारस कोर्ट में उनकी पेशी थी, अदालत के सामने पुलिस वैन से उतरते हुए उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. बदले में पुलिस कस्टडी में अस्पताल में भर्ती साधू सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई.इस गैंगवार से दो बड़े सरगना उभरे, मुख़्तार अंसारी और बृजेश सिंह.ऐसे काम करते हैं बाहुबली*
स्पेशल टास्क फ़ोर्स के आईजी अमिताभ यश बताते हैं, “ज़िला पंचायत से लेकर ब्लॉक अधिकारियों तक, निर्वाचन आधारित हर स्थानीय प्रशासनिक संस्था पर उस इलाक़े के माफ़िया के परिजनों और चेलों का क़ब्ज़ा होता है. माफ़िया का डर ऐसा है कि पत्रकार इनके बारे में कुछ नहीं लिखते, या फिर उनके मनमाफ़िक लिखते हैं.”90 का दशक
1990 का दशक आते-आते पूर्वांचल के माफ़िया ने ख़ुद को राजनीति में लगभग स्थापित कर लिया. पवन बताते हैं, “मुख़्तार के बड़े भाई अफ़जाल अंसारी पहले से ही राजनीति में थे इसलिए मुख़्तार के लिए राजनीति में आना आसान था. बृजेश ने अपने बड़े भाई उदयनाथ सिंह उर्फ़ चुलबुल को राजनीति में उतारा. पहले उदय नाथ सिंह विधान परिषद के सदस्य रहे और उनके बाद उनके बेटे और बृजेश के भतीजे सुशील सिंह विधायक हुए”.दूसरी तरफ, एक-दो अपवादों को छोड़कर अफ़जाल गाज़ीपुर से और मुख़्तार मऊ सीट से लगातार विधानसभा चुनाव लड़ते और जीतते रहे. मुख़्तार और बृजेश आज जेल में हैं लेकिन दोनों ही निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं. बृजेश विधान परिषद के सदस्य हैं, उनके भतीजे सुशील चंदौली से भाजपा के विधायक हैं.मुख़्तार मऊ सीट से विधायक और उनके भाई अफ़जाल अंसारी गाजीपुर से सांसद हैं एसटीएफ़ के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, “बिना राजनीतिक शह के माफ़िया नहीं पनप सकता. राजनीति में जाने का एक कारण अपने व्यापारिक निवेशों को सुरक्षित करना, उन्हें बढ़ाना और राजनीतिक पार्टियों में अपना दख़ल बढ़ाना भी होता है, माफ़िया चाहता है कि एसटीएफ़ को डराकर रखे. उन्हें लगता है कि अगर चुनाव जीत गए तो एसटीएफ एनकाउंटर नहीं करेगी या नहीं कर पाएगी”.माफ़िया को राजनीतिक संरक्षण पवन एक घटना याद करते हैं, “भदोही में एक चुनावी रैली में मुलायम भाषण दे रहे थे. मायावती की सरकार थी और पुलिस भदोही के विधायक और माफ़िया सरगना विजय मिश्रा को खोज रही थी. विजय मिश्रा रैली में पहुंचे, स्टेज पर जाकर मुलायम को बताया कि पुलिस पीछे पड़ी है. भाषण ख़त्म होते ही मुलायम ने पुलिस आधिकारियों से कहा कि विजय उन्हें हेलिकॉप्टर तक छोड़ने जाएंगे, इसके बाद विजय उसी हेलिकॉप्टर से मुलायम के साथ उड़ गए. मुलायम का संदेश साफ़ था कि हम अंत तक अपने आदमी के साथ खड़े रहेंगे.”ज़्यादातर माफ़िया अपनी धर्मपरायण छवि का प्रचार करते हैं. वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक बताते हैं, “बृजेश जेल में भी रोज़ सुबह उठकर गीता पढ़ते हैं और मुख़्तार नमाज़. चुनाव जीतने के लिए यज्ञ करवाना, पंडितों के कहने पर उँगलियों में रत्न पहनना, हफ़्ते के दिनों के हिसाब से कपड़ों के रंग चुनना- यह सब यहां के निर्वाचित बाहुबलियों की जीवन शैली का हिस्सा है”.
इसके साथ ही पूर्वांचल के माफ़िया के नियमों में ड्रग्स और हथियारों का कारोबार न करना, पत्रकारों और वकीलों को न मारना, शराब और नशे से दूर रहना, औरतों और बूढ़ों पर हमले न करना शामिल है.इसी तरह कुछ और नियम हैं, जैसे लड़कियों के साथ छेड़छाड़ न करना, प्रेम विवाह को अक्सर बाहुबलियों का संरक्षण मिल जाता है. उत्पल बताते हैं, “एक श्रीप्रकाश शुक्ला थे जो लड़कियों के चक्कर में मारे गए. उनके एनकाउंटर से भी यहां के बाहुबलियों ने सबक़ लिया और फिर कभी कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया.”
साथ ही, फिटनेस और सेहत पर बाहुबलियों का विशेष ध्यान रहता है. जो निर्वाचित बाहुबली जेल में बंद हैं वो भी सुबह उठकर जेल के मैदान के ही चक्कर लगाते हैं. फल और कम तेल की चीज़ें ज़्यादा खाते हैं.बनारस के पुराने क्राइम रिपोर्टर मुन्ना बजरंगी के बारे में अक्सर यह कहते हैं कि वह नए आदमी को अपनी गैंग में लेने से पहले उनकी परीक्षा लिया करता था. परीक्षा होती थी सिर्फ़ दो गोली में हत्या करके वापस आना. उत्पल जोड़ते हैं, “पूरब का एक आम शूटर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े गैंगस्टरों से ज़्यादा बढ़िया निशाना लगाता है और लंबे समय तक टिका रहता है. यहां एके- 47 की गोलियां बर्बाद करने की नहीं, कम-से-कम गोलियों में काम ख़त्म करने की ट्रेनिंग दी जाती है.”ये हैं एसटीएफ़ की सीमाएं एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ‘सहर’ जैसी फ़िल्मों में एसटीएफ का चित्रण देखकर लोग हमारे काम को सिर्फ़ ‘सर्विलेंस’ समझ लेते हैं जो कि सच से बहुत दूर है. दरअसल, हम अपनी इंटेलिजेंस सिर्फ़ सर्विलेंस से हासिल नहीं करते. हम ग्राउंड पर अपने सूत्र पैदा करने में समय, ताक़त और बुद्धि का निवेश करते हैं”.वे कहते हैं, “एसटीएफ राजनीतिक तौर पर सशक्त नहीं है इसलिए कई बार संगठित अपराध और माफ़ियाओं से जुड़ी बहुत सी जानकारी हम बाहर नहीं ला पाते क्योंकि जानकारी बाहर आने पर मुखबिर को ट्रेस कर लिए जाने का ख़तरा रहता है. एक आम एसटीएफ इंस्पेक्टर भी सैकड़ों राज़ अपने सीने में लिए दुनिया से चला जाता है, लेकिन सोर्स बाहर नहीं आने देता.”2000 के दशक में संगठित माफ़िया का केंद्र गोरखपुर से बनारस शिफ़्ट हुआ और उनकी कार्यप्रणाली में भी कई बड़े परिवर्तन आए. ज़मीन के विवाद से शुरू हुआ गैंगवार अब रेलवे और कोयले के टेंडरों की लड़ाई में तब्दील हो चुका था.उनके काम के तरीक़े को समझाते हुए एसटीएफ़ के आईजी कहते हैं, “बनारस में आज भी मछली और टैक्सी स्टैंड के ठेके ज़िला पंचायत के ज़रिए क्षेत्र के एक बड़े माफ़िया के प्रभाव में ही तय होते हैं. गंगा की तेज़ धार में मछली पकड़ने की मज़दूरी पांच रुपए किलो मिलती है, और माफ़िया हर किलो पर 200 रुपए बनाता है.”ऐसे शुरू हुआ सियासी सिलसिला लंबे समय से बाहुबलियों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक कहते हैं, “इस सिस्टम की शुरुआत सबसे पहले इंदिरा जी ने की. उनके पास गोरखपुर में हरिशंकर तिवारी थे और सिवान-गोपालजंग के इलाक़े में काली पांडे जैसे लोग. बाद में मुलायम सिंह ने इसी सिस्टम को ज़्यादा व्यवस्थित कर दिया. 2000 के आसपास उन्होंने उन सभी बाहुबलियों की पहचान शुरू की जो 2 से 4 सीटों पर प्रभाव रखते थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश को भौगोलिक खेमों को बांट कर उन्होंने एक रणनीति के तहत हर इलाक़े में अपने बाहुबली नेता खड़े किए.”उत्पल पाठक कहते हैं, “इसके बाद बसपा ने भी खुलकर बाहुबलियों को टिकट बांटना शुरू कर दिया. बाहुबली अपनी उगाही से चुनाव के लिए पार्टी फ़ंड का इंतज़ाम भी करते और साथ ही अपने डर और प्रभाव को वोटों में तब्दील कर चुनाव भी जितवाते.”मिर्ज़ापुर और बनारस जैसे शहरों में लंबे समय तक एसपी रहे एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, “पहले तो बंदूक़ की नोक पर टेंडर दिए-लिए जाते थे लेकिन अब जबसे ई-टेंडर का ज़माना आया है तो उन्होंने पढ़े-लिखे स्मार्ट लड़के ई-टेंडर के लिए रख लिए हैं.”पुलिस से लेकर माफ़िया तक ज़्यादातर लोग सुरक्षा कारणों से अपने नाम प्रकाशित नहीं होने देना चाहते. ऐसी ही एक बातचीत में लखनऊ में एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने काफ़ी दिलचस्प बात बताई, “आज का बाहुबली तो नेताओं से भी ज़्यादा पेशेवर नेता है. वोटों के लिए वह जनता के पैर पकड़ने से लेकर तोहफ़े बांटने तक सब कर रहा है. आज पूर्वांचल की जनता डर से नहीं, उनके ग्लैमर से प्रभावित होकर उन्हें वोट देती है.”वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह कहते हैं, “पूर्वांचल के ग्रामीण इलाक़ों में आज भी मुख़्तार और विजय मिश्रा जैसों का ग्लैमर काम करता है. गाँव का आदमी सिर्फ़ इसी बात से ख़ुश हो जाता है कि बाबा ‘दस गो गाड़ी लेके हमरा दुआरे पे आइल रहन’.बाहुबलियों के कामकाज का तकनीकी विश्लेषण करने वाले, एसटीएफ़ के एक वरिष्ठ इंस्पेक्टर ने कागज़ पर चार्ट बनाकर समझाया, “सबसे पहले पैसा उगाही ज़रूरी है. इसके लिए माफ़िया के पास कई रास्ते हैं. जैसे कि मुख़्तार अंसारी टेलीकॉम टावरों, कोयला, बिजली और रियल एस्टेट में फैले अपने व्यापार के ज़रिए उगाही करते हैं”.वे बताते हैं, “बृजेश सिंह कोयला, शराब और ज़मीन के टेंडर से पैसे बनाते हैं. भदोही के विजय मिश्रा और मिर्ज़ापुर-सोनभद्र के विनीत सिंह भी यहां के दो बड़े माफ़िया राजनेता हैं. गिट्टी, सड़क, रेता और ज़मीन से पैसा कमाने वाले विजय मिश्रा ‘धनबल और बाहुबल’ दोनों में काफ़ी मज़बूत हैं. पांच बार विधायक रह चुके हैं. विनीत लंबे वक़्त से बसपा से जुड़े रहे हैं और पैसे से वह भी कमज़ोर नहीं हैं”.एसटीएफ़ के इंस्पेक्टर कहते हैं,”पूर्वांचल में आज करीब 250 के आसपास गैंगस्टर बचे हैं. इनमें से कुछ राजनीति में हैं और जो नहीं हैं वो आना चाहते हैं. इनमें से पांच हज़ार करोड़ रुपए से ऊपर की एसेट वैल्यू वाले 5-7 नाम हैं और 500 करोड़ से ऊपर की एसेट वैल्यू वाले 50 से ज़्यादा नाम. बाक़ी जो 200 बचते हैं, वो टॉप के 5 माफ़ियाओं जैसा बनना चाहते हैं”.
कई एनकाउंटरों में शामिल रहे वरिष्ठ इंस्पेक्टर कहते हैं, “चुनाव में बाहुबली वोट देने और वोट न देने, दोनों चीज़ों के लिए पूर्वांचल में पैसा बंटवाते हैं. यह आम बात है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और ऊँगली पर स्याही लगवा लीजिए”.गोलीबारी और हत्याओं वाले गैंगवार को ‘लगभग समाप्त’ बताते हुए वह आगे कहते हैं, “2005 का कृष्णानंद राय हत्याकांड गोलीबारी का आख़िरी बड़ा मामला था. इसके बाद से यहां के सारे बड़े अपराधी अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि की मदद से ही अपने व्यापार को बढ़ाने लगे और फिर पैसे को सुरक्षित करने के लिए राजनीति में आए”.रॉबिनहुड वाली छवि बनाने की कोशिश वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक बताते हैं, “सभी बाहुबली अपने इलाक़े में होने वाली शादियों में लोगों की मदद करते हैं. ख़ास तौर पर ग़रीबों की बेटियों की शादी में तो ज़रूर. इसी तरह लोगों के मरने पर, लोगों के इलाज पर और कभी कभी तो यूं ही. मान लीजिए, अगर इलाक़े के दस लड़के बाहुबली के पैर छूने आए हैं तो आशीर्वाद में बाबा पांच-दस हज़ार रुपए पकड़ा देंगे. इसे स्ट्रैटीजिक इन्वेस्टमेंट कहते हैं”.लंबे समय तक बनारस में कार्यरत रहे रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक प्रवीण सिंह उत्पल से सहमत हैं, “ज़्यादातर निर्वाचित माफ़िया अपनी रॉबिनहुड की छवि को पुख़्ता रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं. वह लोगों की मदद करके उनको अपनी छत्रछाया में रखते हैं और इस तरीक़े से अपने लिए एक ऐसा वोट बैंक तैयार करते हैं जो कई बार धर्म और जाति से परे भी उनका वफ़ादार रहता है.”अनुभवी डीजी राजेंद्र पाल सिंह कहते हैं, “अपराध एक ऐसा दलदल है जिसमें एक बार घुसने के बाद कई बार ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए अपराधी नए अपराध करता चला जाता है.”

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